Tuesday, 23 May 2017

औरैया का इतिहास

रोहिल्लास के तहत १७६० ई. में अहमद शाह दुर्रानी ने भारत पर आक्रमण किया। उसका पानीपत के मैदान पर मराठों व्दारा १७६१ में विरोध किया गया और उसनें मराठों को एक असाधारण रुप से हार दी। अन्य मराठा सरदारों के अलावा गोविन्द राव पंडित ने भी युद्ध में अपना जीवन खो दिया। भारत से प्रस्थान पूर्व दुर्रानी प्रमुख ने रोहिल्ला सरदारों को देश के बड़े हिस्सों में भेजा। धुंदे खान को शिकोहाबाद, इनायत खांन (हाफीज़ रहमत खान के बेटे) को इटावा मिला जो कि मराठों के कब्जे में था और १७६२ में एक रोहिल्ला सेना मुल्ला मोहसिन खान के नेतृत्व में मराठो से सम्पत्ति हथियाने के लिये भेजी गयी थी। इस सेना का इटावा शहर के निकट किशन राव व बाला राव पंडित, जो यमुना पार की सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध थे, के व्दारा विरोध किया गया। मोहसिन खान व्दारा इटावा के किले की घेराबन्दी की गयी थी लेकिन किलेदार ने जल्द ही आत्मसमर्पण कर दिया और जिला रोहिल्लास के हाथों में चला गया। जमींदारों ने इनायत खान को राजस्व का भुगतान करने से इन्कार कर दिया और अपने किलों में अवज्ञा का अधिकार सुरक्षित कर दिया। शेख कुबेर और मुल्ला बाज़ खान के नेतृत्व में मजबूत सैन्य बल और कुछ तोप खाने रोहिल्लास भेजे गये और बहुत सारे छोटे किले मिट्टी में मिल गये लेकिन इतनी बर्बरता में भी जमुना पार क्षेत्र के कमैत के जमींदार ने इनायत खान के अधिकार का विरोध किया।उसके बाद हाफिज़ रहमत और इनायत खान खुद इटावा आये और जमींदारों के खिलाफ बर्बरतापूर्वक कार्यवाही को तेज किया और अन्ततः वे सन्धि के लिए तैयार हो गये। उसके बाद हाफिज़ रहमत बरेली चले गये और रोहिल्ला चौकियाँ जिले में सुविधाजनक स्थानों पर स्थापित कर दी गयी। इसी बीच एक नए राजा नाजिब खान का दिल्ली में उदय हुआ। नाजिब खान को नाजिब-उद् –दौला, आमिर-उल-उमरा, शुजा उद- दौला के नाम से भी जाना जाता है। नबाब वाजिर ने सफदर जंग में सफलता प्राप्त की और दुर्रानी व्दारा रोहिल्लास की दी गयी जमींन के अलावा बंगश से अलीगढ़ तक की सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया लेकिन फर्रुखाबाद के अफगानों को वाजिर की दुश्मनी बर्दाश्त नहीं हुई और १७६२ में उसने फर्रुखाबाद पर हमले में शामिल होने के लिए नाजिब-उद-दौला को मनाया। हमला हाफिज़ रहमत खान की सहायता से जीता गया। १७६६ में मराठों ने एक बार फिर मल्हार राव, जो अपने अवसर का इन्तजार कर रहा था, के नेतृत्व में जमुना पार करके फंफूद पर आक्रमण कर दिया। जहाँ पर मुहम्मद हसन खान, मोहसिन खान के सबसे बड़े पुत्र के नेतृत्व में रोहिल्लास सेना तैनात की गयी थी। इस खबर के मिलने पर हाफिज़ रहमत बरेली से मराठों का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। फफूँद के करीब उसको शेख कुबेर, इटावा के रोहिल्ला राज्यपाल का साथ मिला और युद्ध में चुनौती देने का तैयारी शुरु हो गयी। लेकिन मल्हार राव ने जोखिम में शामिल होने से मना कर दिया। और एक बार फिर वह जमुना पार चला गया। महत्वाकांक्षी नाजिब-उद-दौला १७६२ में अहमद खान की तरफ से बांग्ला देश की ओर से रोहिल्लास के हस्तक्षेप से काफी चिढ़ गया था और वह भी बदला लेने के लिये जल्दी से अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था, उसने १७७० में हाफिज़ रहमत खान के पतन की साजिश रचना शुरु कर दिया। नाजिब-उद-दौला और मराठों की संयुक्त सेना दिल्ली से आगे बढ़ी, लेकिन कोइल में नाजिब-उद-दौला बीमार पड़ गया और उसने अपने सबसे बड़े पुत्र जबीता खान को मराठों की सहायता करने के लिये छोड़कर अपने कदम पीछे ले लिये। फिर भी जबीता खान ने ,किसी भी तरह से अपने अफगान भाईयों के खिलाफ युद्ध का निपटारा नहीं किया । यह जानने पर मराठों ने उसे अपने शिविर में ही व्यावहारिक रुप से कैदी बना लिया और उसने हाफिज रहमत खाने से अपनी रिहाई प्राप्त करने के लिये अनुरोध किया। तद्नुसार हाफिज रहमत खान ने जबीता खान की रिहाई के लिये मराठों से वार्ता शुरु की, लेकिन मराठा नेताओं ने अपने मूल्य के रुप में इटावा और शिकाहाबाद के जागीर के आत्मसमर्पण की माँग की। हाफिज रहमत खान उन शर्तों पर निपटारा करने के लिये सहमत नहीं था। और वार्ता के दौरान मराठों से सौदा करने के बीच में जबीता खान बच के भाग निकला। अब मराठों और अफगाँन सेनाओं के बीच में कई अनियमित सन्धियाँ हुई। लेकिन जबकि धुंदे खान शिकोहाबाद देने के लिये तैयार हो गया था, इनायत खान ने इटावा देने से मना कर दिया।
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Monday, 22 May 2017

यमुनानगर का इतिहास

यमुना नगर का इतिहास सही मायने में विभाजन के बाद से ही शुरू होता है, सबसे पहले यमुना नगर तब प्रकाश में आया जब बंटवारे के बाद पाकिस्तान से लोग यहाँ पर आये इसमें कुछ कोलोनिओ को सरकार ने उनके लिए ही आरक्षित कर दिए थे।

थोड़ा और पहले का इतिहास देखते है तो हम पाएंगे की यमुना नगर का पहले नाम अब्दुल्लाहपुर था, इसको बाद में जमनानगर और उसके बाद यमुनानगर कर दिया गया और यही नाम १९४७ तक और उसके बाद भी जाना जाता है।

यमुना नगर के इतिहास में इसके जिले बनाये जाने का समय १९४७ के आसपास ही है, जब बंटवारा हुआ तब यमुना नगर अम्बाला जिले का अंतरगत आता था, परन्तु जब इसके प्रशासनिक कार्यो में दिक्कते आयी तो इसे एक पूर्ण जिला बना दिया गया।
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Thursday, 18 May 2017

History of Agra in Hindi

आगरा शहर को सिकंदर लोदी ने सन् 1506 ई. में बसाया था। कहते हैं कि पहले यह नगर आयॅग्रह के नाम से भी जाना जाता था। तौलमी पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया। आगरा मुगल साम्राजय की चहेती जगह थी। आगरा 1526 से 1658 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रहा। आज भी आगरा मुग़लकालीन इमारतों जैसे – ताज महल, लाल किला, फ़तेहपुर सीकरी आदि की वजह से एक विख्यात पर्यटन-स्थल है। आगरा उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक महानगर, ज़िला शहर व तहसील है। विश्व का अजूबा ताजमहल आगरा की पहचान है और यह यमुना नदी के किनारे बसा है। आगरा उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है।
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