रोहिल्लास के तहत १७६० ई. में अहमद शाह दुर्रानी ने भारत पर आक्रमण किया।
उसका पानीपत के मैदान पर मराठों व्दारा १७६१ में विरोध किया गया और उसनें
मराठों को एक असाधारण रुप से हार दी। अन्य मराठा सरदारों के अलावा गोविन्द
राव पंडित ने भी युद्ध में अपना जीवन खो दिया। भारत से प्रस्थान पूर्व
दुर्रानी प्रमुख ने रोहिल्ला सरदारों को देश के बड़े हिस्सों में भेजा।
धुंदे खान को शिकोहाबाद, इनायत खांन (हाफीज़ रहमत खान के बेटे) को इटावा
मिला जो कि मराठों के कब्जे में था और १७६२ में एक रोहिल्ला सेना मुल्ला
मोहसिन खान के नेतृत्व में मराठो से सम्पत्ति हथियाने के लिये भेजी गयी थी।
इस सेना का इटावा शहर के निकट किशन राव व बाला राव पंडित, जो यमुना पार की
सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध थे, के व्दारा विरोध किया गया। मोहसिन खान
व्दारा इटावा के किले की घेराबन्दी की गयी थी लेकिन किलेदार ने जल्द ही
आत्मसमर्पण कर दिया और जिला रोहिल्लास के हाथों में चला गया। जमींदारों ने
इनायत खान को राजस्व का भुगतान करने से इन्कार कर दिया और अपने किलों में
अवज्ञा का अधिकार सुरक्षित कर दिया। शेख कुबेर और मुल्ला बाज़ खान के
नेतृत्व में मजबूत सैन्य बल और कुछ तोप खाने रोहिल्लास भेजे गये और बहुत
सारे छोटे किले मिट्टी में मिल गये लेकिन इतनी बर्बरता में भी जमुना पार
क्षेत्र के कमैत के जमींदार ने इनायत खान के अधिकार का विरोध किया।उसके बाद
हाफिज़ रहमत और इनायत खान खुद इटावा आये और जमींदारों के खिलाफ
बर्बरतापूर्वक कार्यवाही को तेज किया और अन्ततः वे सन्धि के लिए तैयार हो
गये। उसके बाद हाफिज़ रहमत बरेली चले गये और रोहिल्ला चौकियाँ जिले में
सुविधाजनक स्थानों पर स्थापित कर दी गयी। इसी बीच एक नए राजा नाजिब खान का
दिल्ली में उदय हुआ। नाजिब खान को नाजिब-उद् –दौला, आमिर-उल-उमरा, शुजा उद-
दौला के नाम से भी जाना जाता है। नबाब वाजिर ने सफदर जंग में सफलता
प्राप्त की और दुर्रानी व्दारा रोहिल्लास की दी गयी जमींन के अलावा बंगश से
अलीगढ़ तक की सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया लेकिन फर्रुखाबाद के अफगानों को
वाजिर की दुश्मनी बर्दाश्त नहीं हुई और १७६२ में उसने फर्रुखाबाद पर हमले
में शामिल होने के लिए नाजिब-उद-दौला को मनाया। हमला हाफिज़ रहमत खान की
सहायता से जीता गया। १७६६ में मराठों ने एक बार फिर मल्हार राव, जो अपने
अवसर का इन्तजार कर रहा था, के नेतृत्व में जमुना पार करके फंफूद पर आक्रमण
कर दिया। जहाँ पर मुहम्मद हसन खान, मोहसिन खान के सबसे बड़े पुत्र के
नेतृत्व में रोहिल्लास सेना तैनात की गयी थी। इस खबर के मिलने पर हाफिज़
रहमत बरेली से मराठों का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। फफूँद के करीब उसको
शेख कुबेर, इटावा के रोहिल्ला राज्यपाल का साथ मिला और युद्ध में चुनौती
देने का तैयारी शुरु हो गयी। लेकिन मल्हार राव ने जोखिम में शामिल होने से
मना कर दिया। और एक बार फिर वह जमुना पार चला गया। महत्वाकांक्षी
नाजिब-उद-दौला १७६२ में अहमद खान की तरफ से बांग्ला देश की ओर से रोहिल्लास
के हस्तक्षेप से काफी चिढ़ गया था और वह भी बदला लेने के लिये जल्दी से
अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था, उसने १७७० में हाफिज़ रहमत खान
के पतन की साजिश रचना शुरु कर दिया। नाजिब-उद-दौला और मराठों की संयुक्त
सेना दिल्ली से आगे बढ़ी, लेकिन कोइल में नाजिब-उद-दौला बीमार पड़ गया और
उसने अपने सबसे बड़े पुत्र जबीता खान को मराठों की सहायता करने के लिये
छोड़कर अपने कदम पीछे ले लिये। फिर भी जबीता खान ने ,किसी भी तरह से अपने
अफगान भाईयों के खिलाफ युद्ध का निपटारा नहीं किया । यह जानने पर मराठों ने
उसे अपने शिविर में ही व्यावहारिक रुप से कैदी बना लिया और उसने हाफिज
रहमत खाने से अपनी रिहाई प्राप्त करने के लिये अनुरोध किया। तद्नुसार हाफिज
रहमत खान ने जबीता खान की रिहाई के लिये मराठों से वार्ता शुरु की, लेकिन
मराठा नेताओं ने अपने मूल्य के रुप में इटावा और शिकाहाबाद के जागीर के
आत्मसमर्पण की माँग की। हाफिज रहमत खान उन शर्तों पर निपटारा करने के लिये
सहमत नहीं था। और वार्ता के दौरान मराठों से सौदा करने के बीच में जबीता
खान बच के भाग निकला। अब मराठों और अफगाँन सेनाओं के बीच में कई अनियमित
सन्धियाँ हुई। लेकिन जबकि धुंदे खान शिकोहाबाद देने के लिये तैयार हो गया
था, इनायत खान ने इटावा देने से मना कर दिया।
Read more- औरैया उत्तर प्रदेश , Where is Auraiya
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