Sunday, 29 November 2015

संत रविदास नगर जिला उत्तर प्रदेश



 
संत रविदास नगर जिला भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय ज्ञानपुर में है। सन्त रविदास नगर को भदोही जिले के नाम से भी जाना जाता है। पहले यह वाराणसी जिले में था।भदोही जिला इलाहाबाद और वाराणसी के बीच मे स्थित है| यहा का कालीन उद्योग विश्व प्रसिद्ध है और कृषी के बाद दूसरा प्रमुख रोजगार का श्रोत है| Facts about Sant RaviNagar

इस जिले की उत्पत्ति ३० जून १९९४ को भदोही के नाम से उत्तर प्रदेश के ६५ वे जिले के रूप में हुआ था। लेकिन बाद में मायावती सरकार ने इसका नाम संत रविदास नगर रख दिया। यह जिला "कारपेट सिटी " के नाम से विश्व में प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के सबसे छोटे जिले में गिना जाता है। उत्‍तर प्रदेश के पूर्वाचंल क्षेत्र के प्रमुख जनपद वाराणसी से 1996 में बना सन्‍त रविदास नगर जिला आम जन के द्वारा भदोही नाम से जाना जाता है। इलाहाबाद, जौनपुर, वाराणसी, मीरजापुर की सीमाओं को स्‍पर्श करता यह जिला अपने कालीन उद्योग के कारण विश्‍व में अत्‍यन्‍त प्रसिद्ध है।

इस जनपद का मुख्‍य व्‍यवसाय कालीन है। यहां के कालीन उद्योग का लिखित साक्ष्‍य 16वीं सदी के रचना आइन-ए-अकबरी से मिलने लगता है। वैसे कालीन उद्योग का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। पहला कालीन लगभग 3000 0 पूर्व‍ मिश्र वासियों ने बनाया था। मिश्रवासी बुनाई कला के अच्‍छे ज्ञाता थे। वहीं से यह कला फारस पहुंची लेकिन अरब संस्‍कृति की वजह से इसका विकास बाधित हो गया। अब्‍बासी खलीफाओं के समय में रचित अरेबियन नाइट्स कहानियों में जिन्‍न के साथ कालीनों के उड़ने का उल्‍लेख मिलता है। इन कहानियों में वर्णित हारून-उल-रशीद वास्‍तव में खलीफा थे जिन्‍हें अरबों का एक छत्र प्रभुत्‍व समाप्‍त करने का श्रेय दिया जाता है। अब्‍बासी खलीफाओं के पश्‍चात इस्‍लामिक साम्राज्‍य का विकेन्‍द्रीकरण हुआ तथा तुर्की व इस्‍लामिक राज्‍यों का उदय हुआ। मुगल राज्‍य भी उन्‍हीं में से एक था। फारस से मुगलों के साथ कालीन बनाने की कला भारत आयी। कश्‍मीर को मुगलों ने इस कला के लिए उपयुक्‍त स्‍थल के रूप में चुना जहाँ से यहाँ उत्‍तर-प्रदेश, राजस्‍थान व पंजाब पहुंची।

1580 0 में मुगल बादशाह अकबर ने फारस से कुछ कालीन बुनकरों को अपने दरबार में बुलाया था। इन बुनकरों ने कसान, इफशान और हेराती नमूनों के कालीनें अकबर को भेंट की। अकबर इन कालीनों से बहुत प्रभावित हुआ उसने आगरा, दिल्‍ली और लाहौर में कालीन बुनाई प्रशिक्षण एवं उत्‍पाद केन्‍द्र खोल दिये। इसके बाद आगरा से बुनकरो का एक दल जी0 टी0 रोड के रास्‍ते बंगाल की ओर अग्रसर हुआ। रात्रि विश्राम के लिए यह हल घोसिया-माधोसिंह में रूका। इस दल ने यहाँ रूकने पर कालीन निर्माण का प्रयास किया। स्‍थानीय शासक और जुलाहों के माध्‍यम से यहाँ कालीन बुनाई की सुविधा प्राप्‍त हो गयी। धीरे-धीरे भदोही के जुलाहे इस कार्य में कुशल होते गए। वे आस-पास की रियासतों मे घूम-घूम कर कालीन बेचते थे और धन एकत्र करते थे। other facts about SantRavi Nagar



ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी के व्‍यापारी इस कालीन निर्माण की कला से बहुत प्रभावित थे उन्‍होने अन्‍य हस्‍तशिल्‍पों का विनाश करना अपना दायित्‍व समझा था लेकिन कालीन की गुणवत्‍ता और इसके यूरोपीय बाजार मूल्‍य को देखकर इस हस्‍तशिल्‍प पर हाथ नहीं लगाया। 1851 में ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी ने यहाँ के बने कालीनों को विश्‍व प्रदर्शनी में रखा जिसे सर्वोत्‍क्रष्‍ट माना गया। अर्न्‍तराष्‍ट्रीय बाज़ार में कालीन के 6 मुख्‍य उत्‍पादक हैं- ईरान, चीन, भारत, पाकिस्‍तान, नेपाल, तुर्की नाटेड कालीन निर्यात का 90 प्रतिशत ईरान, चीन, भारत और नेपाल से होता है जिसमें ईरान 30 प्रतिशत, भारत 20 प्रतिशत और नेपाल का हिस्‍सा 10 प्रतिशत है। कालीन निर्यात का 95 प्रतिशत यूरोप और अमेरिका में जाता है। अकेले जर्मनी 40 प्रतिशत कालीन आयात करता है। भदोही के कालीनो के निर्माण के सम्‍बन्‍ध में आश्‍चर्य जनक बात यह है कि यहा इस उद्योग का कच्‍चामाल पैदा नहीं होता। केवल कुशल श्रम की उपलब्‍धता ही सबसे बड़ा अस्‍त्र है। जिसके बल पर भदोही अपनी छाप विश्‍व बाज़ार में बनाए है।

भूगोल

भारत के भौगोलिक मानचित्र पर यह जिला मध्‍य गंगा घाटी में 25.09 अक्षांश उत्‍तरी से 25.32 उत्‍तरी अक्षांश तक तथा 82.45 देशान्‍तर पूर्वी तक फैला है। 1056 वर्ग कि0मी0 क्षेत्रफल वाले इस जिले की जनसंख्‍या 10,77630 है। ज्ञानपुर औराई, भदोही तीन तहसील मुख्‍यालयों के अधीन डीघ, अमोली, सुरियावां, ज्ञानपुर औराई और भदोही विकास खण्‍ड कर्यालय है। इलाहाबाद के हंडिया और प्रतापपुर विधानसभा के साथ मिलकर संसदीय क्षेत्र बनाने वाले इस जनपद मे 3 विधान सभा क्षेत्र ज्ञानपुर औराई और भदोही हैं। यह जिला गंगा के मैदानी इलाके में बसा हुआ है। इसका दक्षिणी सीमा में गंगा नदी है। जिले के उत्तर दिशा में जौनपुर पूर्व में वाराणसी और मिर्ज़ापुर, दक्षिण और पश्चिम में इलाहबाद स्थित है। सबसे प्रसिद्ध गंगा घाट रामपुर का घाट है। जिले का घनत्व 1055.99 km². है। गंगा नदी से तीनो दिशाओ से घिरा कोनिया क्षेत्र जैसे प्राकृतिक क्षेत्र इस जिले में आते है। बाबा हरिहर नाथ मंदिर (ज्ञानपुर),सीता समाहित स्थल (सीतामढ़ी), बाबा गंगेश्वरनाथ धाम (इटहरा), इत्यादि यहाँ के प्रमुख मदिर है।


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The Shahjahanpur History






Shahjahanpur was established by Diler Khan and Bahadur Khan,[1] sons of Dariya Khan, a soldier in the army of Mughal Emperor Jahangir. Both Diler Khan and Bahadur Khan were dignitaries in the regime of Shahjahan. Pleased with the services of Diler Khan, Shahjahan gave him 17 villages with the permission to construct fort. Diler Khan developed a fort at Nainar Khera, situated on the rivers Garrah and Khannaut. He also established 52 types of Pathan's Caste. Today most of the mohallas are included in the name of these castes.Facts about Shahjahanpur



There are two mazārs which connect Shahjahanpur city from one corner to the other corner. One majar is of Shaheed Ahmad Ullah Shah, a great freedom fighter of the 1857 struggle, and another is Shaheed Ashfaqallah Khan ( of Kakori Kand ). Maulvi Ahamad Ullah Shah began his struggle in Faizabad (U.P.). From there, he went to Shahjahanpur, where his life ended. Seventy years later, Ashfaqullah initiated a struggle against the British government and was hanged in the prison of Faizabad.

Shahjahanpur made a considerable contribution to the Indian Rebellion of 1857. Nana Sahib Peshwa of Bithur, Shahjade from Delhi, Ahmad Ullah Shah from Faizabad and Khan Badahur Khan from Bareilly united here and planned for further actions in the struggle. Maulvi Ahamad Ullah Shah was killed by British forces in Powayan. other facts about Shahjahanpur


Freedom fighters Maulvi Ahamad Ullah Shah, Nazim Ali and Bakshi were unsuccessful in their efforts, but later Shaheed Ram Prasad Bismil, Ashfaqullah Khan, and Roshan Singh made major contributions to the freedom movement. In 1916 a society in the name of Matrivedi Sangh was formed by Bismil under the leadership of Pt. Genda Lal Dixit ( known for Mainpuri conspiracy ). Its purpose was to raise funds for the struggle, but because of a lack of funds, members of the society turned to adopt robbery.know about about Shahjahanpur

After Mahatma Gandhi withdrew his support from the movement, Ram Prasad Bismil founded Hindustan Republican Association under the joint leadership of Jogesh Chandra Chatterjee and Sachindra Nath Sanyal. To implement the plan, and contributions were sought. Once again, when contributions were not adequate, robbery became the main fund-raising technique.